मोक्ष प्राप्ति का उत्तम साधन मनुष्य जीवन अज्ञान के कारण जीव जन्म-मरण रूपी संसार चक्र में पड़ता है। हे देवेश! हे भगवन्! हे शरणागतवत्सल! सभी...
मोक्ष प्राप्ति का उत्तम साधन मनुष्य जीवन
अज्ञान के कारण जीव जन्म-मरण रूपी संसार चक्र में पड़ता है। हे देवेश! हे भगवन्! हे शरणागतवत्सल! सभी प्रकार के दुःखों से मलिन तथा सार रहित इस भयावह संसार में अनेक प्रकार के शरीर धारण करके अनन्त जीव राशियां उत्पन्न होती है और मरती है, उनका कोई अन्त नहीं है। सभी सदैव दुःख से पीडित रहते है, इन्हें कही सुख की प्राप्ति नहीं होती, किन्तु किस प्रकार से या किन कर्मों को करने से हमें इस संसृति चक्र से मुक्ति प्राप्त होगी? हे मोक्षेश (मोक्ष प्रदान करने वाले) भगवन् ऐसा कुछ ज्ञान हमे दीजिए।
भगवानुवाच - परब्रह्म परमात्मा परब्रह्मस्वरूप, शिवरूप, सर्वज्ञ, सर्वकर्त्ता, सर्वेश्वर, निर्मल, निष्कल (कलारहित) तथा अद्वय (द्वैतभावशून्य) है। परमात्मा स्वतः प्रकाश है, अनादि, अनन्त, निर्विकार, परात्पर, निर्गुण और सत्चित् आनन्दस्वरूप है, यह जीव उसी का अंश है।
जैसे अग्नि से बहुत से स्फुलिंग (चिनगारियां) निकलते है, उसी प्रकार अनादिकालीन अविद्या से युक्त होने के कारण अनादि काल से किये जाने वाले कर्मों के परिणामस्वरूप देहादि उपाधि को धारण कर जीव भगवान् से पृथक हो गये है। जीव प्रत्येक जन्म में पुण्य और पाप रूप सुख-दुःख प्रदान करने वाले कर्मों से नियन्त्रित होकर देह, आयु व भोगों को प्राप्त करते है,
ये जीव कभी स्थावर (वृक्ष-लतादि जड़) योनियों में, पुनः कृमियोनियों में तदन्तर जलचर, पक्षी और पशुयोनियों को प्राप्त करते हुए मनुष्ययोनि प्राप्त करते है, फिर धार्मिक मनुष्य के रूप में और पुनः देवता और देवयोनि के पश्चात क्रमशः मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी होते है। उद्भिज्ज, अण्डज, स्वेदज और पिण्डज (जरायुज) - इन चार प्रकार के शरीरों को सहस्रों बार धारण करके उनसे मुक्त होकर सुर्कमवश (पुण्यप्रभाव से) जीव मनुष्य शरीर प्राप्त करता है और यदि वह ज्ञानी हो जाए तो मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
जीवों की चौरासी लाख योनियों में मनुष्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी योनि में तत्वज्ञान प्राप्त नहीं होता। विभिन्न योनियों में हजारों-हजार करोड़ों बार जन्म लेने के अनन्तर उपार्जित पुण्यपुञ्ज के कारण शायद (कदाचित्) मनुष्य योनि प्राप्त होती है।
मोक्ष प्राप्ति के लिये सोपानभूत यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त करके इस संसृति चक्र (जीवन-मरण चक्र) से जो अपने को मुक्त नहीं कर लेता, उससे अधिक पापी और अभागा कौन होगा? अर्थात् यह मानव देह ही ऐसी उत्तम योनि है जो हजारों-हजारों वर्षों में किए हुए पुण्यों के उदय होने पर ही प्राप्त होती है और यह भी नश्वर है। लेकिन इसी देह से तत्वज्ञान, आत्मज्ञान पाकर हम अपने को मोक्ष का अधिकारी बना सकते है अन्यथा फिर से लख-चौरासी के जंजाल में घुमते रहना पड़ेगा।
शरीर के बिना कोई भी जीव पुरुषार्थ नहीं कर सकता, इसलिए शरीर और धन की रक्षा करता हुआ दोनों से पुण्यार्जन करना चाहिए। मनुष्य को सर्वदा अपनी देह की रक्षा करनी चाहिए ; क्योंकि शरीर ही सभी पुरुषार्थों का एकमात्र साधन है।
गांव, क्षेत्र, धन, घर और शुभाशुभ कर्म पुनः-पुनः प्राप्त हो सकते है। किन्तु मनुष्य शरीर पुनः-पुनः प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए शरीर की रक्षा धर्माचरण के उद्देश्य से और धर्माचरण ज्ञानप्राप्ति के उद्देश्य से (उसी प्रकार) ज्ञान ध्यान एवं योग की सिद्धि के लिए और जो शेष है ,वह भी बाल्यावस्था, रोग और जरा में होने वाले दुःख से बीत जाता है। प्रारम्भ करने योग्य कार्य के विषय में जो उद्योग नहीं करता और जहां ब्रह्मचिन्तन आदि में जागरूक होना चाहिए, वहां सोता रहता है, उसका पतन निश्चित ही होता है।
जल में उठने वाले फैन के समान अतीव क्षणभंगुर देह में ममता रखना कोरी मूर्खता है, जो अहित करने वाले विषयभोगों में ही हित बुद्धि रखता है तथा अनिश्चित पुत्र-कलत्र-देह-गेहादि) को स्थायी समझता है और भौतिक धन सम्पत्ति आदि अनर्थकारी वस्तुओं में जो अर्थबुद्धि रखता है वह अपने परमार्थ को, अपने हित को या भलाई को नहीं समझता है।
कर्म वही है, जो बन्धन का हेतु नहीं होता तथा विद्या वही है, जो मोक्ष प्रदान करा दे और इसके अतिरिक्त कर्म केवल श्रममात्र के हेतु है। जो शरीर के लिए क्लेशप्रदा है तथा अन्य प्रकार की विद्या शिल्पचातुर्यमात्र है, जब तक कर्म किये जाते है, जब तक संसार में आसक्ति रहती है, जब तक इन्द्रियों का चाञ्चल्य बना रहता है, तब तक तत्वज्ञान की बात ही कहां हो सकती है?
जब तक देहाभिमान (देह को अपना स्वरूप मानना) है, जब तक ममता रहती है। जब तक प्रयत्नों का वेग रहता है, जब तक सङ्कल्प की कल्पना होती रहती है, जब तक मन स्थिर नहीं हो जाता है, जब तक शास्त्र का चिन्तन नहीं किया जाता तथा जब तक गुरु की कृपा नहीं प्राप्त होती, तब तक तत्वज्ञान की चर्चा ही कहां होती है? यदि अपने मोक्ष की इच्छा हो तो सर्वदा, सम्पूर्ण प्रयत्नों का सभी अवस्थाओं में निरन्तर प्रयासरत रहकर तत्वज्ञान की प्राप्ति में संलग्न रहना चाहिए।



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