THE ART OF DYING – ‘मरने की कला’ आत्मा की अंतिम पुकार जब यह आत्मा मेरे इस नश्वर शरीर को छोड़कर अनंत यात्रा पर प्रस्थान करने लगे… जब जीवन...
THE ART OF DYING – ‘मरने की कला’
आत्मा की अंतिम पुकार
मैं मेरा ना रहूँ, मेरा रहे ना कोई।सब कुछ तेरा ही प्रभु, तेरा मैं भी होई।।
मेरा तो कुछ है ही नहीं प्रभु!
हे गोपाल! तूने बहुत नचायो…
तुम्हारे हाथों का यह खिलौना अब थक चुका है, क्योंकि — “गोपाल! तूने बहुत नचायो…”
उसी प्रकार हे परमेश्वर! आप इस सम्पूर्ण सृष्टि की परममाता हैं। मैं आपका पुत्र होकर भी इस मायाजाल में भटक गया, कुपथगामी बन गया, कुकर्मों में फँस गया, और आपकी कृपा का अनाधिकारी बन बैठा।
किन्तु प्रभु…
अब इस थके हुए जीव को अपने चरणों में स्थान दे दीजिए।बस इतना अनुग्रह कर दीजिए कि यह भटका हुआ मन अंततः आपमें ही विश्राम पा ले।।
हे मधुसूदन! अब अज्ञान तिमिर का नाश कर दीजिए|
हे मधुसूदन! मैं यह अधम जीव अज्ञान के गहरे गर्त में गिरा हुआ हूँ। आपकी दुस्तर माया ने मेरे मन को मोह, ममता, मद, अहंकार और क्रोध के बंधनों में इस प्रकार जकड़ रखा है कि मैं दिशा-विहीन होकर संसार में भटकता फिर रहा हूँ। बुद्धिहीन और अज्ञानी बनकर यह जीव अज्ञान-सागर की लहरों में बहता जा रहा है, किन्तु भीतर कहीं आत्मा अपने उद्धार के लिए निरंतर तड़प रही है।
ना जाने कब यह नश्वर काया साथ छोड़ दे? इसलिए हे प्रभु! उससे पूर्व ही मुझे ऐसी गति प्रदान कर दीजिए कि मैं इस मायाजाल को भेदकर अपनी आत्मा के उत्थान का मार्ग खोज सकूँ।मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा मस्तिष्क ही नहीं, अपितु मेरा सम्पूर्ण अन्तर्मन एक नवीन सृजन प्राप्त करे—ऐसा सृजन, जिसका अंतिम उद्देश्य केवल आपको प्राप्त करना हो।फिर न कोई वासना शेष रहे, न कोई चाह, न कोई परिकल्पना— बस एकमात्र तुम… केवल तुम।
देहात्मबुद्धि के प्रभाव में हमारा जीवन व्यर्थ ही व्यतीत होता जा रहा है। परिवार, संबंध, धन, मोह, लोभ, स्वार्थ और स्वाद की इच्छाएँ मन को अनगिनत उलझनों में बाँधे रखती हैं।कभी प्रेम पाने की चाह, कभी धन-संचय की चिंता, कभी संतान और प्रतिष्ठा की आकांक्षा—इन सबके बीच सम्पूर्ण जीवन एक संग्राम बनकर रह जाता है।
हे मधुसूदन! हे केशव! हे गिरिवरनंद किशोर! हे कृपासागर!
मैं यह दीन-हीन प्राणी आपसे अपने जीवन और मरण दोनों को सफल बनाने का ज्ञान माँगता हूँ। एक बार अपनी कृपा का घट खोलकर अपने इस जीव पर कृपादृष्टि कर दीजिए।मेरे अन्तर्मन के अज्ञान-अंधकार का नाश कर दीजिए।
जन्म, जरा, व्याधि और मृत्यु के इस अनंत चक्र से अब हमें निवृत्त कर दीजिए। धन-संचय, भौतिक सुखों और सांसारिक उपलब्धियों की जिन लालसाओं में यह मन निरंतर भटकता फिर रहा है, उस भटकाव और मूर्खता का अंत कर दीजिए।



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