प्रतिक्षण का सदुपयोग प्रतिक्षण, प्रतिपल, प्रत्येक श्वास से पहले ही नहीं अपितु कुछ भी नया कार्य करने से पहले हम यदि मृत्यु को याद कर लें और...
प्रतिक्षण का सदुपयोग
किस कार्य को करने से हमारे मरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
किस प्रकार के कर्म हम कर रहे हैं?
उन कर्मों का हमारे अन्त समय पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
क्या हमारे पुण्यों का संचय होगा या पापों में वृद्धि होगी?
क्या अमुक कर्म करने से प्रभु प्रसन्न होंगे?
क्या अमुक कर्म करके हमें आत्मग्लानि तो नहीं होगी?
हम यदि सावधान होकर अपना प्रतिक्षण सुधार लें तो शायद अन्त समय सुधर जाएगा और फिर यह डर नहीं रहेगा कि हमारा क्या होगा?
मृत्यु तो ऐसी छलिया है कि, एक क्षण भी हमें प्रदान नहीं करती और न जाने किस क्षण आकर हमारा गला दबा देगी। मृत्यु को तो एक पल भी भूलना मूर्खता सी लगती है।
मृत्यु ही मनुष्य की सच्ची संगिनी है, उसकी भार्या है या यह कह लो कि मृत्यु तो हमारी परछाईं है या हम और मृत्यु दो नहीं हैं एक ही हैं क्योंकि जो परम सत्य है वही मृत्यु है, क्योंकि हमारा देह नश्वर है, जो वस्तु नश्वर है उसकी मृत्यु तो होगी ही तो मृत वस्तु से क्या प्रेम करना, क्या आसक्ति रखना?
यदि प्रेम करना ही है तो अपने भीतर बसे आनन्ददेव से प्रेम करो ताकि जो सदैव निरन्तर रहने वाला, कभी नष्ट न होने वाला अमित देव है, वही तो हमारा आत्मदेव पूर्ण परमात्मा का अंश है, सो प्रतिक्षण का सुधार ही अपने अन्तकाल का सुधार है।
यदि मृत्यु को उज्ज्वल करना है, तो प्रतिक्षण को उजागर करो, प्रतिक्षण जो प्रभु के सुमिरण में व्यतीत होता हैं उसी क्षण में मृत्यु सुधरती है।

COMMENTS