संगकीर्तन-1 प्रिय रीडर्स आप सभी जैसे जानते है की यह ब्लॉग केवल हरिनाम चर्चा, उनके प्रेम और अनुभूति को समर्पित है, मार्ग कोई भी हो प्रभु ...
संगकीर्तन-1
प्रिय रीडर्स आप सभी जैसे जानते है की यह ब्लॉग केवल हरिनाम चर्चा, उनके प्रेम और अनुभूति को समर्पित है, मार्ग कोई भी हो प्रभु को पाने का किन्तु संगकीर्तन = संग + कीर्तन अर्थात आओ संग में कीर्तन करे और क्यों करे? क्योंकि हम सब को आलोकिक (Divine love) प्रेम को पाना है, आलोकिक प्रेम क्या है, जो मिले और छूट जाए ऐसा नहीं बल्कि अमर प्रेम जो निस्वार्थ प्रेम है, जो प्रेम मीरा बाई जी ने किया, जो शबरी माँ ने किया, जो भक्त सुदामा ने किया, जो गोपियों ने किया ऐसा दिव्या-प्रेम, जो कर्मा बाई ने किया जो नरसिंह भगत ने किया, और ऐसे दिव्य प्रेम रस को संत एकनाथ,नामदेव, तुकाराम, चैतन्य महाप्रभु, श्री हरिवंश जी, श्री हरिदास जी, और अनेकानेक रसिकजन ने नाम संकीर्तन के माध्यम से हम सब के उद्धार के लिए प्रगट किया, ऐसे ही भजनो की गंगा का प्रवाह और उसी प्रवाह की एक धरा प्रस्तुत कर रहा हु आशा है आप को पसंद आएगा यह भजन,
पूर्णिमा साध्वी जी द्वारा गया यह भजन बहुत ही भावपूर्ण और आलोकिक भाव है, जिसमे स्पष्ट चेतावनी दी गयी है की भक्ति मार्ग पर चलना बहुत आसान नहीं है, इस प्रेम नगरी में प्रवेश करने से पहले जरा सोच समझ लेना .........................................ये संतो का प्रेम नगर है, यहां सम्भल कर आना जी
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