निताई गौर राधेश्याम, निताई गौर राधेश्याम निताई गौर राधेश्याम,निताई गौर राधेश्याम राधेश्याम लेके नाम झूम लू, जो भी बोले राधे रा...
निताई गौर राधेश्याम, निताई गौर राधेश्याम
निताई गौर राधेश्याम,निताई गौर राधेश्याम
राधेश्याम लेके नाम झूम लू,
जो भी बोले राधे राधे, राधे राधे राधे राधे.
उनके पाँव चुम लू, उनके पाँव चुम लू
निताई गौर राधेश्याम, निताई गौर राधेश्याम
निताई गौर राधेश्याम,निताई गौर राधेश्याम
"कलियुग केवल नाम आधार सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पार "
जहां कलिकाल अत्यंत कठोर काल है, झा पाप-अत्याचार, झूठ-कपट, काम-क्रोध-लोभ अभिमान का राज है, जहां रक्षक ही भक्षक है, जिस काल में सधारण मनुष्य ही नहीं धर्मविद लोग भी पापी और अत्याचार में लिप्त है, जहां विश्वस्त साधन भक्ति के लिए मिलना बहुत मुश्किल है, जब मन बार बार भटकता है, जहां कोई नीतियुक्त धर्मगुरु नहीं मिलता है, जहां हज़ारो पंथ अपने अपने को सही कहते है, सब का उपास्य एक होते हुए भी भिन्न भिन्न पद्धतियां है, जहां मतभेद है, वहां कौन सा ऐसा साधन है जो हमे भक्ति में ले जा सकता है? कौन ऐसा गुरु है जो भटके हुए मन को शांत कर सकता है?
कलियुग में जहां चारो और नास्तिकता दिखाई देती है, चारो और अंधेर है किन्तु इस कलिकाल की सबसे बड़ी विषेशता यह भी है की इस काल में भक्ति बहुत सरल है, बस थोड़े से संयम से सही राह पकड़ने की जरूरत है, कलियुग में केवल सद्ग्रन्थ ही गुरु बनने योग्य है, श्री रामचरितमानस, श्री गीता जी, श्री मद्भगवद जैसे ग्रन्थ ही मनुष्य को सही दृष्टि प्रदान करने में सहायक है,
जहां कलिकाल में भक्ति के साधन जप-तप, व्रत-नियम, त्याग-संयम आदि का निर्वाह करना कठिन हो गया है, वहीं सबसे सरल साधन बताया गया है, नाम सुमिरन , भजन,संकीर्तन, प्रभु का निरन्तर नाम-जप ही कलिकाल में सबसे बड़ा साधन है प्रभु प्राप्ति के लिए, नाम की महिमा को सभी ग्रंथो ने बताया है, और इससे सरल कुछ नहीं है, नाम संकीर्तन, मेरी इस पोस्ट में एक ऐसा ही भजन प्रस्तुत है जिसमे नाम सुमिरन तो है ही हमारे प्रिय महाराज जी भी झूम झूम कर नाम-संकीर्तन का आनंद ले रहे है, इससे ज्यादा नाम-संकीर्तन की महिमा क्या हो सकती है?
जैसा की मेरा ब्लॉग divine love प्रभु भक्ति को समर्पित है मेरा id भी संग्किर्त्तना है, अर्थात सब मिल कर कीर्तन करे,
जय श्री राधेश्याम .....
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