महफ़िल ऐ मुशायरा (बेख़ुद)
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महफ़िल ऐ मुशायरा (बेख़ुद)

वैसे तो हर शख़्स का अपना अंदाज होता है हाल ऐ दिल ब्यां करने का लेकिन कुछ ख़ास लोगो का अंदाज भी बेहद अनूठा होता है दिले एहसास को सुनान...

गोबिंद चले आओ , गोपाल चले आओ ....
सब मिल कर कीर्तन करे,
मेरी झोपडी के भाग आज खुल जायेंगे ....राम आएंगे,


वैसे तो हर शख़्स का अपना अंदाज होता है हाल ऐ दिल ब्यां करने का लेकिन कुछ ख़ास लोगो का अंदाज भी बेहद अनूठा होता है दिले एहसास को सुनाने का, तो आइये आज ऐसे ही एक नए अंदाज को ब्यां करने वाले कवि बेखुद की कलम का जादू देखते है, महफ़िल ऐ मुशायरा के इस शीर्षक में,

सितमगर आशिक़ (1)

फूलों से भँवरे सवाल पूछते हैं,

किसने चुराया पराग पूछते हैं,
अभी कसर है लुत्फ़-ए-सितम में,
सितमग़र हमारा मिज़ाज पूछते हैं।

बेख़ुद।

मेरा मन (2)

मुझको मेरे ग़म के साये में रहने दो,
दोस्तों,मुझको अपनी राय में रहने दो।
सयानों की दुनिया में जी न सकूँगा मैं,
मुझको दीवानों की सराय में रहने दो।
बेखुद।


मेरा अहम (3)

यूँ तो चिंगरियों की जुगनुओं सी औक़ात होती है,
बस्तियाँ जल जाती हैं गर हवा के साथ होती है,
यूँ तो ज़माने में हमारी समझ की मिसालें हैं,पर,
हार जाता हूँ मैं, जब अपनी अना से बात होती है।
बेखुद।

(अना -मैं, अहम)

ईद मुबारक।(4)

मायूस दिलों को या खुदा थोड़ी सी उम्मीदी दे दे,
बेक़रार दिलों को आज तू दीदार-ए-सनम की ईदी दे दे।
बेखुद।

रूहानी असबाब (5)


ऐ दिले नादाँ तू क्या मांगता है।

इन्सां को है काफ़ी, रोटी,कपडा और मकाँ,
क्यूँ वहशियत का सामान मांगता है।

गुनाह कर तो लिए हमने छुपकर दुनिया से,
क्यूँ मुझसे मेरा ज़मीर हिसाब माँगता है।

ज़ीस्त-ए-दरिया का सुकून छोटी छोटी मौजों से,
क्यूँ दरिया-ए-ज़ीस्त में सैलाब मांगता है।

खुदा तुझको भी देगा तुझको तेरे लिहाज से,
क्यूँ उससे बेवक़्त और बेहिसाब माँगता है।

अभी आगाज-ए-इश्क़ है,थोडा सब्र कर नादाँ,
क्यूँ अभी से उसका हिज़ाब मांगता है।

रिन्द-ए-नज़र हूँ मैं , मयखाना जानता है,
क्यूँ मयकशी को गिलास मांगता है।

मोहब्बत एक एहसास है दिलों के दरमियान, 
क्यूँ जिस्म से रूहानी असबाब माँगता है,

उसकी नज़रें हैं क़ातिल, उससे नज़रें मिलाकर,
क्यूँ ख़ुदकुशी का ‘बेख़ुद’ औज़ार मांगता है।

बेखुद ।

ज़ीस्त-ए-दरिया - नदी का जीवन
दरिया-ए-ज़ीस्त- नदी रूपी जीवन
मौजों - लहरों
आग़ाज़ -शुरुआत
रिन्द-ए-नज़र — आँखों से पीने वाला
रूहानी - रूह से सम्बंधित
असबाब-सामान

काबिल-ए इबादत (6)
ये अब्र के बहाने ना करते तो क्या करते,
कोई तसव्वुर में ना समाये तो क्या करते,
काबिल-ए इबादत हैं वो लबरेज़ खुदाई से,
किसी ला-इंतिहां शय की इबारत क्या करते।


बेखुद।


औसत बारिश की फुहार। (7)

ये अब्र जो आज बरसे, बड़े हिसाब से बरसे,
आज भी हम इबारत-ए-हुस्न लिख ना सके,
बड़ी देर हो गयी अब्र को तमीज आते आते,
वो इत्ते सादा-मिज़ाज़ नही कि बारहा संवरते।
बेखुद। 



वर्षा और विरह (8)
अब्र तो जम कर बरसे, पर इतना भी ना बरसना था,
किसी की छत टपके, हद से इतना भी ना गुजरना था,
आसमाँ में बिजली चमकी, इधर धरती की बिजली गुल,
पर इन्हें क्या,जो इबारते हुस्न हमे मुकम्मल करना था।
बेखुद।  

अधूरा सावन (9)
ये अब्र जो आज बरसे, थोड़े और बरस सकते थे,
हवाओं की तासीर थोड़ी और सर्द कर सकते थे,
ज़ुल्फ़ों के पेंच-ओ-खम से निकले, कमर की खम-ओ-पेंच में फिसल गए,
वर्ना इबारत-ए-हुस्न आज पूरी कर सकते थे।

बेखुद। 

वर्षा और उम्मीद (10)
ये अब्र क्यूं आज ज़रा से बरस के रह गए,
तेरी उमस-ए-उम्मीद में झुलस के रह गए,
सोचा था तेरे हुस्न की नई इबारत लिखेंगे,
तेरे ज़ुल्फ़ की पेंचोखम में उलझ के रह गए।

बेखुद।




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महफ़िल ऐ मुशायरा (बेख़ुद)
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