सहज मुक्ति-( गीतामृतम्)

  गीतामृतम् श्री गीता में अर्जुन जब युद्ध के मैदान में शोकातुर हो गया और उसने अपने रिश्तेदारों को अपना मान कर शोक करने लगा और गांडीव यह कहकर...

 गीतामृतम्

श्री गीता में अर्जुन जब युद्ध के मैदान में शोकातुर हो गया और उसने अपने रिश्तेदारों को अपना मान कर शोक करने लगा और गांडीव यह कहकर रख दिया कि मैं युद्ध नहीं करूंगा। तब श्री कृष्ण चन्द्र के अधरामृत से जो ज्ञान निकला उसके कुछ अंशों का यहाँ भी जानना आवश्यक है।

श्री भगवानुवाच — अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञा वादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

तुमने शोक न करने योग्य का शोक किया है, क्योंकि जिनके प्राण चले गये हैं और जिनके प्राण नहीं गये हैं विद्वान लोग उनके लिए शोक नहीं करते। शरीर हमेशा मृत्यु में रहता है, शरीर नश्वर कभी भी नष्ट होगा ही, यह सत्य है कोई इसे मना नहीं कर सकता है, फिर इसका शोक क्यों और आत्मा कभी भी नहीं मरती है, यह सदा अमरता में रहती है, इसलिए जो अमर है उसका शोक क्यों करना? इसलिए दोनों शरीर व आत्मा का शोक करने का कोई औचित्य, सार, नहीं है।

“न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥”

किसी काल में मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये सब राजा भी नहीं थे, ये बात भी नहीं है, और भविष्य में (मैं, तू और ये) हम सभी नहीं रहेंगे, ये बात भी नहीं है, अर्थात हमारे जन्म से पहले हमारी आत्मा थी, अभी भी है और हमारे मरने के बाद भी रहेगी।

इस एक चिन्मय (अजर, अमर) सतामात्र के सिवाय कुछ नहीं है फिर दुख क्यों करना?

“देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तर प्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥”

मनुष्य के जन्म से ही उसकी मृत्यु होती रहती है, आत्मा तो अमर है, शरीर निरन्तर मृत्यु में जा रहा है, मृत्यु का यह क्रम जीव के गर्भ में आते ही प्रारम्भ हो जाता है,

गर्भावस्था से निकलने पर बाल्यावस्था आती है, बाल्यावस्था गुजरती है, तो यौवन आता है, जैसे ही यौवन व्यतीत होता है, तो बुढ़ापा आ जाता है, फिर बुढ़ापा गया तो मृत्यु और फिर पुनः जन्म इत्यादि नया जीवन चक्र प्रारम्भ होता जाता है।

इस प्रकार शरीर की अवस्थाएँ बदलती रहती हैं किन्तु शरीरी (आत्मा) ज्यों का त्यों रहता है, संसार की समस्त परिस्थितियाँ आने-जाने वाली, मिलने बिछुड़ने वाली हैं, मनुष्य यह चाहता है कि सुखदायी परिस्थितियाँ बनी रहे और दुखदायी परिस्थितियाँ न आये। परन्तु सुखदायी परिस्थिति जाती ही है और दुःखदायी परिस्थिति आती ही है - यह प्राकृतिक नियम है अथवा प्रभु का मंगलमय विधान है। अतः साधक को प्रत्येक परिस्थितियाँ स्वीकार करनी चाहिए।

जो वस्तु बदलने वाली है उनमें स्थिरता देखना भूल है, यह शरीर भी चल है इसे निरन्तर एक जैसा बनाये रखना भूल ही नहीं, बल्कि असम्भव है। इसी भूल के रहते ममता और कामनाओं की उत्पत्ति होती है, जिसके कारण वस्तु मुख्य दिखती है, क्रिया गौण। लेकिन जो वास्तव में सत्य है वह क्रिया-ही-क्रिया है, वस्तु तो नष्ट होने वाली है।

“समदुःख सुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते”

दुःख व सुख में सम रहने वाले बुद्धिमान मनुष्य को संसार के पदार्थ विचलित नहीं करते और वही अमरत्व प्राप्त कर लेते हैं अर्थात् मिले हुए और बिछुड़ने वाले शरीर को मैं और मेरा तथा मेरे लिए मानना ही एक मात्र भूल है, जब मनुष्य का विवेक मर जाता है तभी यह सब भूल (मैं और मेरा) होती है। इसलिए ही दुःख व सुख की अनुभूतियाँ होती हैं, वरना जिन मनुष्यों का विवेक जग गया हो, तब वह निर्मम-निरहंकार हो जाता है, निर्मम-निरहंकार होते ही साधक में समता आ जाती है।

“न जायते म्रियते वा कदाचितायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥”

यह आत्मा न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला नहीं है, यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहने वाला, शाश्वत और अनादि है। शरीर के मर जाने पर भी यह नहीं मारा जाता है।

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णन्यानि संयाति नवानि देही॥

जैसे हम वस्त्रों का बदल-2 कर अपना रूप तो बदल लेते हैं, लेकिन रहते तो वही मनुष्य हैं, उसी प्रकार आत्मा रूपी मानव शरीर रूपी वस्त्र बदलता है, विभिन्न प्रकार के शरीर, आत्मा के वस्त्र हैं, कभी यह हाथी बनता है तो कभी चूहा ,कभी स्त्री कभी पुरुष, लेकिन आत्मा तो वही की वही है। जैसे रंगमंच पर एक व्यक्ति राम की भूमिका निभाता है तो कभी वही भरत का या अन्य किरदार निभाता है, उसी प्रकार आत्मा ऐसा करती है, हीरो तो वही है किरदार चाहें जो भी हो अर्थात् आत्मा ही की सत्ता है और कुछ नहीं।

नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।

यह शरीर (आत्मा) बांटा नहीं जा सकता, यह जलाया नहीं जा सकता, यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता, क्योंकि आत्मा नित्य रहने वाला, सबमें परिपूर्ण अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है। आत्मा की अनुभूति को वायु की भांति काटा नहीं जा सकता, यह कोई वस्तु नहीं है, जिसे खण्डित किया जा सके, न ही यह सुख व दुख की अग्नि में जलती है अर्थात् ऐसी कोई तापाग्नि नहीं है, जो इसे तपन महसूस करवा सके, नहीं आत्मा को कोई तापत्रय की खिन्नता से भरा मन या अश्रुधारा गीला कर सकता है, अर्थात् आत्मा तो निलेंप है, जैसे कि कमल पुष्प के पत्र जल में रहकर भी जल को धारण नहीं करते, उसी प्रकार आत्मा भी इस संसार में रहते हुए, संसार की सत्ता से विलग है।

''अथ चैनं नित्यजातां नित्यं वा मन्यसे मृत्तम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि|

हे महाबाहो! अगर तुम इसे शरीर को निम्न कोटिवाला अथवा नित्य मरनेवाला भी मानो, तो भी तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

पैदा हुए की जरूर मृत्यु होगी और मरे हुए का जन्म जाकर होगा, अतः (इस जन्म-मरणरूप परिवर्तन के प्रवाह का) निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए, संसार की वस्तुएँ संसार के लिए ही होती हैं, उनका उपयोग केवल संसार की सेवा के लिए ही हो सकता है। अपने लिए नहीं। जन्म से पहले हम अप्रकट थे और मरने के बाद अप्रकट होंगे। केवल बीच में ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करने की बात ही क्या है?

श्री भागवत जी के प्रथम स्कन्ध में नवासी अध्याय है। जिसमें श्री कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को भीष्मपितामह के मरणोपरांत उनके शोक निवारण हेतु समझाया, मृत्यु मनोरथ ने समझाया कि “हे युधिष्ठिर! जिस तरह की मृत्यु संसार में भीष्मपितामह ने पाई है, इस तरह की मृत्यु दूसरे को भी सकना बहुत कठिन है, संसार में जिसने तन धारण किया है वह एक न एक दिन अवश्य मरेगा, इस वास्ते इसके मरने का शोक त्याग कर हमें प्रसन्न होना चाहिए, जो कोई मनुष्य का तन पावे और जो संसार के विषयों में फँसा रहे, वह पशुवत् से विह्वल रहकर अपना जीवन व्यर्थ नष्ट करके व्यतीत करेगा उसी का शोक होना चाहिए, सो भीष्मपितामह संसार में क्षत्रियों के धर्मानुसार रणक्षेत्र में शरीर त्यागने के उपरांत वैकुण्ठ को गये, इसलिए तुम्हें इनके मरण का शोक नहीं करना चाहिए।"


इस प्रकार प्रभु के वचनों को सुनकर युधिष्ठिर सहित सभी ने धैर्य धारण किया। यहाँ इस संवाद का उल्लेख करने का यही उद्देश्य है कि जो हमारा संसार से चला गया है उसकी मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए व उसके सद्गुणों का चिंतन करके उस दिवंगत जीवात्मा के कल्याण के लिए मंगलमय प्रभु की मंगलमय स्तुति व प्रार्थना में समय देना चाहिए।

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सहज मुक्ति-( गीतामृतम्)
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