सहज मुक्ति (मंगलमय — जीवन और मरण)

 मंगलमय – जीवन और मरण इस अध्याय में बताया गया है कि जो मनुष्य अपने जीवन और मरण दोनों को मंगलमय बनाना चाहता है, उसके लिए प्रभु ने विभिन्न अवत...

 मंगलमय – जीवन और मरण

इस अध्याय में बताया गया है कि जो मनुष्य अपने जीवन और मरण दोनों को मंगलमय बनाना चाहता है, उसके लिए प्रभु ने विभिन्न अवतारों के माध्यम से मार्गदर्शन दिया है।

भीष्मपितामह का उदाहरण:

मुरली मनोहर (श्रीकृष्ण) स्वयं कहते हैं कि भीष्मपितामह ने भक्तिपूर्वक व धर्मसंयुक्त जीवन जीकर अंत में बैकुण्ठ को प्राप्त किया। उनका जीवन मंगलमय जीवन की कला का आदर्श उदाहरण है।

अंतिम क्षण:

हजारों बाणों से बिंधे होने के बावजूद भीष्म पितामह ने अपना ध्यान श्रीश्यामसुन्दर के चतुर्भुज रूप में लगाए रखा।मृत्यु के समय वे भगवान की स्तुति करते हुए कहने लगे — "हे ज्योतिस्वरूप परब्रह्म, आप केवल अपने भक्तों की इच्छा पूर्ण करने के वास्ते अवतार धारण करते हैं..."

भीष्म जी श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि,"जिस तरह आप दया करके मेरे सामने बैठे हैं, उसी तरह प्राण छोड़ते समय भी आपके चरणों का ध्यान मेरे हृदय में बना रहे।आपकी सांवली, मोहनी मूर्ति का ध्यान करके मनुष्य पापों से छूटकर भवसागर पार कर सकते हैं। मृत्यु के समय साठ हजार बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने जितना कष्ट होता है, जिससे मनुष्य अचेत हो जाता है — पर जिन पर आपकी कृपा होती है, वे उस समय भी आपके चरणों का ध्यान रखकर भवसागर पार कर जाते हैं।"

भीष्म जी का अंतिम क्षण:

ज्योतिस्वरूप का ध्यान हृदय में रखकर, श्यामसुन्दर को प्रणाम करके उन्होंने आँखें बंद कर लीं। योगाभ्यास के साथ देह त्यागकर बैकुण्ठवास प्राप्त किया।उनके मंगलमय मरण पर देवताओं ने आकाश से फूलों की वर्षा की।

मंगलमय मृत्यु को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के अष्टम अध्याय का पठन व चिंतन अवश्य करना चाहिए।

अर्जुन का प्रश्न (गीता अष्टम अध्याय):

अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं — हे मधुसूदन! आपकी माया से भ्रमित मनुष्य अंतकाल में आपको कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

श्रीकृष्ण का उत्तर (श्लोक):

"अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।।"

अर्थ — जो मनुष्य अंतकाल में मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह निश्चित रूप से मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।



अजामिल का उदाहरण:

अजामिल अत्यंत दुराचारी था, किंतु उसने अपने पुत्र का नाम नारायण रखा। अंत समय में पुत्र को पुकारते हुए भगवान का स्मरण हो गया और यही उसकी मुक्ति का कारण बना।

भगवान कहते हैं — चाहे जीवन कैसा भी रहा हो, यदि अंत समय में मुझे याद कर लो तो मैं कल्याण करूंगा।हर क्षण अंतिम हो सकता है, इसलिए हर समय भगवान को याद रखना चाहिए।

दूसरा श्लोक:

"यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।"

अर्थ — मृत्यु के समय जिस भाव को स्मरण करते हुए शरीर छोड़ा जाता है, उसी भाव को प्राप्त होता है।

मनुष्य अंतकाल में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी योनि में जाता है। भगवान ने मनुष्य को यह स्वतंत्रता दी है कि वह जो गति चाहे प्राप्त कर सकता है।

श्लोक:

कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।

भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।।"

अर्थ: जो सर्वज्ञ, अनादि, सूक्ष्म से सूक्ष्म, सूर्य की तरह प्रकाशस्वरूप परमेश्वर का चिंतन करता है — वह भक्तियुक्त मनुष्य अंत समय में अचल मन से योगबल द्वारा भ्रुकुटि के मध्य प्राण स्थापित करके उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।

श्लोक:    

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥ ८.१२॥

ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥ ८.१३॥

जो साधक समस्त इन्द्रियों को वश में करके, मन को हृदय में स्थिर कर, प्राणों को मस्तक में स्थापित कर योगधारण में स्थित होता है, और “ॐ” इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए मेरा स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक:

"अनन्य चेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।"

अर्थ: हे पृथानन्दन! जो अनन्य चित्त से मेरा नित्य-निरंतर स्मरण करता है, उस योगी के लिए मैं सुलभ हूँ।

अंतिम संदेश:

भोग और संग्रह में लगे सकाम मनुष्य के लिए यह संसार दुखों का घर है, परंतु सेवा और भगवद्भजन में लगे निष्काम मनुष्य के लिए यह संसार भगवत् स्वरूप है।

COMMENTS

Name

Divine satsang,3,Festival Special,6,Hanuman Ji,4,Happy Life,13,Inspiration,4,karmyog-geeta gyaan,8,Krishan Chaiynya Mahaprbhu,12,krishna consciousness,18,MOTIVATION,1,Navratri,2,Pundrik Ji Goswami,5,RAM MANDIR NIRMAAN,4,Relations,2,sangkirtna,22,Vrindavan Darshan,1,आनंद की ओर,3,इरशाद,2,गोपीगीत,7,तंत्र -मंत्र या विज्ञान,1,न भूतो न भविष्यति,1,भक्तमाल,10,रासलीला,1,श्याम-विरहणी,2,श्री कृष्ण बाललीला,2,श्रीराधा-माधव-चिंतन,7,साधना और सिद्धि,9,होली के पद,2,
ltr
item
DIVINE LOVE: सहज मुक्ति (मंगलमय — जीवन और मरण)
सहज मुक्ति (मंगलमय — जीवन और मरण)
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjFZ53B1Jh5iRzXEvBSyQQvJbi56uSQ-IB7__6HBFjU09cEVgcFj5TOAIQI8HCMpfxyf2qhPwYMj_oedDovckUarRG4TggoHzgEgSogjBQBLzCgg-8-kEjIIbnZp6TXOGKDOONRAd24ZnYvQso3cV4rkVWT1dAPgHO8d5Qs7_NO638laIyxLHG6yCVuzRI/w400-h330/c.jpg
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjFZ53B1Jh5iRzXEvBSyQQvJbi56uSQ-IB7__6HBFjU09cEVgcFj5TOAIQI8HCMpfxyf2qhPwYMj_oedDovckUarRG4TggoHzgEgSogjBQBLzCgg-8-kEjIIbnZp6TXOGKDOONRAd24ZnYvQso3cV4rkVWT1dAPgHO8d5Qs7_NO638laIyxLHG6yCVuzRI/s72-w400-c-h330/c.jpg
DIVINE LOVE
https://divinelovevikas.blogspot.com/2026/05/httpsdivinelovevikas.blogspot.com202605sahajmukti.html
https://divinelovevikas.blogspot.com/
https://divinelovevikas.blogspot.com/
https://divinelovevikas.blogspot.com/2026/05/httpsdivinelovevikas.blogspot.com202605sahajmukti.html
true
4400599221121763347
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy