महफ़िल ऐ मुशायरा : जीवन के एहसास (बेख़ुद) समय के साथ साथ कुछ यादे,कुछ एहसास,कुछ खट्टे कुछ मीठे अनुभव,कुछ मिटटी की सौंधी सी खुशबू से...
समय के साथ साथ कुछ यादे,कुछ एहसास,कुछ खट्टे कुछ मीठे अनुभव,कुछ मिटटी की सौंधी सी खुशबू से एहसास कुछ रिश्तों के कसैले से अनुभव कुछ यादें कुछ वादें तरो ताज़ा हो जाते है, अतीत की सुनहेलियाँ जब याद करने पर दिल मचलने लगता है,तड़पने लगता है और कोई उस बात को साँझा न करने वाला हो तो केवल शब्द ही ऐसे दोस्त है जो उन अनुभवों को साँझा करते है, और उन शब्दों के मोतियों को बहुत ही सलीके से सहेज कर कंठहार बना दिया जाए तो वह एक सुंदर कविता बन जाती है, वह एहसास फिर केवल एक के नहीं अपितु अनेको के दिल से जुड़ जाते है, ऐसे ही शब्दों के मोतियों को पिरोने वाले कवि बेखुद की कुछ रचनाये मेरे इस महफिले मुशायरा के दूसरे भाग (जीवन के एहसास) में प्रस्तुत है आप सबके लिए , उम्मीद है आप सबको बेहद पसंद आएगा ये हकीकत अंदाजे बयाँ....
आज की हकीकत
जर्जर सही पर गाँव का मकाँ घर लगता है,
मुझे शहरी छत-ओ-दीवार से डर लगता है।
कल की खबरों से दहशत-ज़दा हूँ, और
कल आने वाले अख़बार से डर लगता है।
मासूम गुनहगारों के गिरेबाँ तो उधड़े हुए हैं,
सजीले दरवेशों के अवतार से डर लगता है।
मर्ज़ को समझा दिया है अब टीसता नही है,
ऐ चारागर पर तेरे औज़ार से डर लगता है।
कहां जाएं, सांस लें,ज़हरीली हवाओं में,
अब तो सुबह की बयार से डर लगता है।
जाने हमसफ़र का आगे का सफ़र क्या है ,
यूँ साहिल से पहले, मझधार में डर लगता है।
जो रफ्ता रफ्ता आये तो सम्भले से रहते हैं,
ग़र आये बेशुमार ,तो प्यार से डर लगता है।
क्यूं खुशी में ये गम के साये चिपके रहते हैं,
जैसे इतवार को सोमवार से डर लगता है।*
बेख़ुद।
{सजीले दरवेशों-आजकल के माडर्न और फ़ैशनबल बाबा चारागर- चिकित्सक , डॉक्टर}
मन
बुद्धि से भी बुद्धिमान मन है,
बुद्धि वकील है, न्यायधीश मन है।
बेख़ुद
जज़्बातों के सट्टे मत खेलो,
पूँजी रिश्तों की बचा न सकोगे।
जो मौन न पढ़ पाये, उसे
शब्दों से समझा ना सकोगे।
व्याकरण में उलझ गए तो,
सार को तुम पा ना सकोगे,
निःशब्द गर हुए नहीं तो,
अनहद नाद सुन ना सकोगे।
बेख़ुद।
अनहद नाद-आत्म ध्वनि।
रिश्तो की नुमायशी
किसी नुमाइश का ग़ुमाँ हो,घर को इतना भी ना सजाया जाए,
अपनी मर्ज़ी से रहते हैं घर में अपने, कुछ तो निशाँ छोड़े जाए।
ये तहज़ीब की बातें, सलीक़ा-ए-गुफ़्तगू,सब ज़रूरी है लेकिन,
अपने ही बच्चों को ‘आप आप’कहके, पराया ना किया जाए।
बेख़ुद।
राहें पुरानी
पुरानी राहों पर अब चलता कौन है,
फूलों को देख अब मचलता कौन है।
हर कोई गुम है बस अपने जहान में,
किसी की ओर आज तकता कौन है।
हर शख़्स कहता है उसपे ज़ुल्म हुआ है ,
पता तो लगाओ फिर जुर्म करता कौन है।
इबादतें होती हैं अब सियासी हुक्मरानों की,
उस उपरवाले ख़ुदा से अब डरता कौन है।
पते सब जला दिए ,पुराने सब रफीक़ों के,
के पुराने पते पर अब मिलता कौन है।
एक वीरानी सी है, एहसासों के अंजुमन में,
के मीर-ओ-ग़ालिब को अब पढ़ता कौन है।
बेखुद।
नई तस्वीर
नये ज़माने की नई तस्वीर देख रहा हूँ,
नये पुराने के बीच लकीर देख रहा हूँ,
रेशमी पैरहन है पर दिल के फ़क़ीर लोग,
धीरे धीरे मरता कबीर देख रहा हूँ।
बेखुद।
रिश्तों के जख्म
कुछ पुराने ज़ख्म भी जीने का मज़ा देते हैं,
घाव दिल के मुझे अपनों का पता देते हैं,
अब ज़िंदा रहने को ज़ख्मों का ही सहारा है
ज़ख्म जब सूखने लगे तो नश्तर चुभा देते हैं।
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