"कृष्ण केवल नाम ही पर्याप्त है" दुर्योधन और अर्जुन का संवाद में दुर्योधन कहता है, अर्जुन से, मेरे पास चतुरंगिणी सेना है, स...
"कृष्ण केवल नाम ही पर्याप्त है" दुर्योधन और अर्जुन का संवाद में दुर्योधन कहता है, अर्जुन से, मेरे पास चतुरंगिणी सेना है, सो -सो भाई है, भीष्म है, द्रोण है, कर्ण,अश्व्थामा,कृपाचार्य और सभी बड़े बड़े शूरवीर मेरे पास है, तुम्हारे पास क्या है ? अर्जुन कहते है," मेरे पास श्री कृष्ण है", बस कृष्ण ही पर्याप्त है,
यह तो एक काल्पनिक दृष्टान्त है, किन्तु यह सदैव सत्य है की केवल कृष्ण ही पर्याप्त है,
प्रह्लाद जी के पास सब कुछ, शूरवीर पिता, महल, धन-दौलत, जो भी कुछ चाहिए सब किन्तु फिर भी क्या काम आया, कुछ नहीं, पिता ने पहाड़ से गिराया, कौन काम आया? केवल कृष्ण, अग्नि में जलाना चाहा,कौन काम आया? केवल कृष्ण, खम्बे से तपाया गया, कौन बचाने आया? केवल कृष्ण, क्यों क्योंकि प्रह्लाद के जीवन में केवल कृष्ण ही है,
ध्रुव जी के पिता एक बड़े राजा, महलो के स्वामी, धन दौलत से परिपूर्ण, किन्तु कौन काम आया? केवल नारायण श्री हरि, जग का पिता कुछ काम न आया, केवल जगद्पिता ही काम आया,
द्रोपदी, जिसके पति पांच पांडव, हस्तिनापुर की कुलवधू, भीष्म, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र राजा, महाराज की बेटी, किन्तु जब लाज लूट रही थी, कौन काम आया? केवल श्री कृष्ण,
मीरा जी महलो की रानी, फिर भी कितने कष्टों में रह रही थी , जहर का पियाला पिलाया गया, कौन काम आया? श्री कृष्ण, सर्प से कटवाने का प्रयास किया गया, कौन बचाने आया? केवल श्री कृष्ण, कांटो की सेज पर सुलाया गया, कौन बचाने आया? केवल मीरा के गिरधर गोपाल, क्यों? क्योंकि मीरा के जीवन में केवल गिरधर गोपाल ही है, मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई, अर्थात जीवन में कोई दूसरा है ही नहीं, एक ही आस, एक ही विश्वास केवल कृष्ण,
इसीलिए जीव को शरणागति करना ही है, तो कृष्ण की करो, जग के सब भोग- विलास मिल सकते है, रिश्ते मधुर भी हो सकते है, सब कुछ सुखमय हो सकता है, किन्तु जब समय विपरीत होता है तो कौन काम आएगा? कहने की आवश्यकता है, क्या? केवल और केवल श्री कृष्ण, इसलिए जो आदि, अनादि और परम् शाश्वत है, जो और केवल जो हमारा है, वह है श्री कृष्ण,
'कृष्ण केवल नाम ही पर्याप्त है' कौन है कृष्ण? क्या कोई पुरुष है? क्या कोई मूर्ति है? क्या केवल नाम है कृष्ण? क्या है कृष्ण? क्या कृष्ण कोई सम्प्रदाय है?
कृष्ण कोई आकृति का नाम नहीं है, कृष्ण कोई पुरुष, स्त्री या कोई बालक या जीव नहीं है, कृष्ण केवल उच्चारण का शब्द भी नहीं है,कृष्ण कोई मजहब नहीं है, कोई सम्प्रदाय विशेष नहीं है,
कृष्ण तुम्हारी चेतना है, कृष्ण तुम्हारी आत्मा है, कृष्ण तुम्हारा परमार्थ, परोपकार तत्व है, कृष्ण तुम्हारे भीतर बैठा सत्य है, कृष्ण तुम्हारा विवेक है, कृष्ण तुम्हारा बौद्ध है,कृष्ण सहनशीलता है,कृष्ण प्रेम है,कृष्ण करुणा है, कृष्ण धर्म है,कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक व्यक्तित्व की पराकाष्ठा है, जीवन के भीतर जितने भी सद्गुण होने चाहिए, उन सब सद्गुणों का नाम कृष्ण है,
तुम जिसे खोज रहे हो, वह कृष्ण कोई और नहीं तुम स्वयं हो, जिस दिन तुमने यह जानने का प्रयास किया ' who am i ? मैं कौन हूँ? कौन हूँ मैं? और जान लिया की कौन हूँ मैं, तो अपने आप को और कृष्ण को दो नहीं पाओगे, केवल कृष्ण को पाओगे, तुम तुम न रहोगे, कृष्ण कृष्ण और केवल कृष्ण ही होगा,
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