सहज मुक्ति (‘जीवन व मरण’)

  ‘जीवन व मरण’ जीवन और मरण क्या है? केवल दो गतियाँ हैं।  " जिसमें साँसों का चलना होता है, वह जीवन है और जब साँसें रुक जाती हैं तो उसे म...

 

‘जीवन व मरण’

जीवन और मरण क्या है? केवल दो गतियाँ हैं। 

"जिसमें साँसों का चलना होता है, वह जीवन है और जब साँसें रुक जाती हैं तो उसे मरण कहते हैं।" दोनों ही क्रियाएँ स्वाभाविक और शाश्वत हैं। यदि साँसें चलना आरम्भ करेंगी, अर्थात जन्म होगा, तो मरण भी होगा। ये दोनों ही गतियाँ सत्य हैं। फिर जो तथ्य निश्चित है, उसका हर्ष और शोक क्यों करना? जन्म होने पर हम खुशियाँ मनाते हैं, बधाई बाँटते हैं, लेकिन मरण पर रोते हैं।

जीवन और मरण तो जीवों की दो स्थितियाँ हैं—एक पहली और दूसरी अंतिम। एक जीव का जग में आने की और दूसरी जग को अलविदा कहने की। इनके बीच का जो समय है, वह केवल अच्छे कर्म करके पुण्य कमाने, परमेश्वर की साधना व जप करने के लिए है।


लेकिन हम जन्म होते ही अनेक अपेक्षाएँ लगा लेते हैं। जैसे कि यह मेरा बेटा है, पोता है, नाती है या कोई अन्य रिश्ता। फिर हम उम्मीद करते हैं कि यह बड़ा होकर डॉक्टर, अफसर या साहूकार बनेगा, धन कमाएगा और सुख देगा। जीव के जग में आने से पहले ही अनेक भ्रांतियाँ मन में घर कर लेती हैं और बेवजह हर्ष या शोक का कारण बन जाती हैं।

जीव का आगमन मनुष्य योनि में मोक्ष प्राप्ति के लिए, अर्थात ईश्वर-प्राप्ति के लिए होता है। प्रभु ने जीव को जग में आत्मकल्याण के लिए भेजा है, न कि किसी दूसरे के सुख या दुख का कारण बनने के लिए। 

जीव को उसके पूर्व कर्मों के फलस्वरूप भेजा जाता है और उसी प्रकार बुला लिया जाता है। न कुछ साथ लाया, न कुछ साथ ले जाएगा—केवल कर्म और उनके अनुसार मिलने वाला फल ही साथ रहता है।

"खाली हाथ आया जग में, खाली हाथ जाएगा।
बंद मुट्ठी भेजा प्रभु ने, हाथ पसारे बुलाएगा॥"

जैसे हम रेलगाड़ी में दो दिन का सफर करते हैं और साथी यात्रियों से संबंध बना लेते हैं, उसी प्रकार अपने-अपने स्टेशन पर पहुँचकर अलग हो जाते हैं। फिर कोई सुख या दुख नहीं रहता। ऐसे ही इस जग में जीव कुछ समय के लिए आया है और समय पूरा होने पर साथ छोड़ जाएगा। फिर हर्ष या शोक क्यों? जो सत्य मनुष्य के जन्म के समय ही निश्चित हो जाता है कि वह एक दिन हमसे अलग होगा, तो फिर उसे झुठलाकर अन्य भ्रांतियाँ क्यों पालें? बल्कि जो साथ मिला, उसके लिए प्रभु का धन्यवाद करना चाहिए।

श्री रामचरितमानस की कथा है—जब महाराज दशरथ का देहांत होता है और भरत व अन्य नगरवासी शोक से व्याकुल होते हैं, तब श्री वशिष्ठ जी अन्य ऋषियों सहित उपस्थित होकर शोक सभा को संबोधित करते हुए कहते हैं,

"वशिष्ठ जी ने पहले दशरथ जी के शुभ कर्मों का वर्णन किया और समझाया कि दशरथ जी किसी भी प्रकार शोक के पात्र नहीं हैं। शोक तो उन लोगों का करना चाहिए, " जो मनुष्य जन्म पाकर दुष्कर्म करते हैं। जिस व्यक्ति को ब्राह्मण का शरीर मिला हो, फिर भी वह वेद-शास्त्रों को न जानता हो और अपने धर्म को छोड़कर विषयों में लीन रहता हो—वह शोक के योग्य है। उस वैरागी का शोक करना चाहिए जो मोहवश कर्मों का त्याग करता है। उस संन्यासी का शोक करना चाहिए जो ज्ञान और वैराग्य छोड़कर सांसारिक भोगों में फँसा हुआ है। शोकनीय वह नारी है जो छल-कपट करती है, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारी है। सबसे अधिक शोकनीय वह है जो अपने समय और संपत्ति का दुरुपयोग करता है, दूसरों का अनिष्ट करता है, अपने शरीर और इंद्रियों के भोग में ही लगा रहता है और नाम मात्र भी हरि-भक्ति नहीं करता।"

महाराज दशरथ के लिए शोक क्यों करें? उनका राम-प्रेम सच्चा था—इतना सच्चा कि उन्होंने राम-प्रेम में अपने प्राण त्याग दिए। उनका इहलोक भी सुधर गया और परलोक भी।

यहाँ समझने की बात यह है कि जिसे हम अपना प्रिय मानते हैं, यदि वह इस संसार से चला गया, तो क्या वह वास्तव में शोकनीय है? 

जिस प्रकार के कर्म करके मनुष्य शोकनीय होता है, क्या उसने वैसे कर्म किए हैं? यदि नहीं, तो शोक क्यों? यदि मनुष्य अपने जीवन का सही उपयोग करके, अच्छे कर्म करके इस संसार से विदा हुआ है, तो दुख क्यों? वह जिस उद्देश्य से संसार में आया था, यदि उसे पूरा करके गया, तो फिर दुख क्यों?

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सहज मुक्ति (‘जीवन व मरण’)
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