रासलीला भगवान् को प्राप्ति का सबसे सुगम मार्ग है, हरि भजन के लिए फिर भी थोड़ा यत्न करना पद सकता है किन्तु रास के लिए तो केवल रास दर्शन ...
रासलीला भगवान् को प्राप्ति का सबसे सुगम मार्ग है, हरि भजन के लिए फिर भी थोड़ा यत्न करना पद सकता है किन्तु रास के लिए तो केवल रास दर्शन मात्र से प्रभु से भाव अंतर्निहित हो जाते है, जैसे जैसे प्रभु की लीला देखते है, जैसे जैसे व्यास जी द्वारा पदों का गायन सुनते है, ठकुर जी की थिरकन होती है हृदय प्रफुल्लित होने लगता है, सहज समाधि सी लग जाती है,उस रूप को निहारने की,बिन पलक खप्के नेत्र प्रभु का नर्तन देखते है, उनके रूप-राशि का पान करते है, मधुर चिंतन में मन खो जाता है, ऐसा अद्भुत प्रभाव है रासलीला दर्शन का,
आज में कोई कहानी या ज्ञान की बात नहीं करता बल्कि मेरा स्वयं का अनुभव रासलीला के प्रति आप सब से साँझा करना चाहता हूँ, हाँ मैं रासलीला को पसंद करता हूँ,समर्थन करता हूँ,किन्तु आज मैं रासलीला का समर्थन करने के लिए नहीं लिख रहा बल्कि मेरे जीवन का अनुभव बता रहा हूँ जोकि बिलकुल सत्य घटना है मेरे जीवन की,
आज से पांच साल पहले के लगभग की बात है,मेरा जीवन परेशानियों का सामना कर रहा था, मेरा दिमाग बिलकुल खराब रहता था, ऐसे में डीप्रेशन का शिकार बन गया, बहुत ही खराब स्थिति बन गयी, दिन रात रोना होता था, बहुत ही घबराहट रहती थी, कोई भी आहात से डॉ लगता, घर की घंटी बजती तो घबराहट होने लगती, कोई जोर से आवाज भी करता तो मैं सहम जाता था, किसी से मिलना-बोलना पसंद नहीं था, जमीन पर पड़ा रोटा, या दीवार में समा जाना चाहता था, मेरी माँ और घर के सभी लोग परेशान रहते थे, मुझे भी बहुत तकलीफ होती खुद के लिए भी और अपने घरवालों के लिए भी, डॉक्टर को दिखाया तो नींद की गोलिया और कुछ दवाये दी जिससे नींद आती थी, मणोचिकितस्क को दिखाने के लिए कहा गया, बहुत से इलाज करने का प्रयत्न किया गया, किन्तु मुझे बहुत ही डीप्रेशन रहने लगा,
आप सब सोच रहे होंगे इस रामकथा में रासलीला कहा से आ गयी? अब बताता हूँ कैसे भगवान् की रासलीला ने मेरे इस रोग का निवारण किया, या कह लो कैसे मेरे ऊपर ठाकुर जी की साक्षात् कृपा वर्षण हुयी,
मेरी ऐसी स्थिति में मेरे एक परम् मित्र ने मुझे रासलीला से मिलवाया, अर्थात उन्ही दिनों मेरे इन मित्र के घर वृन्दावन धाम से रासमण्डल के व्यास पधारे, और रासलीला करवाने हेतु कहा, मेरे इन मित्र के परिवार वाले जोकि परम रसिक लोग है,पास ही अपने पैतृक गाँव में उनकी रासलीला की वयवस्था कर दी, और चार दिनों तक होने वाली रासलीला में रोज़ जाने लगे, मेरे इस मित्र ने मुझे भी चलने को कहा,लकिन मेरी ऐसी दशा में मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहता, किन्तु बचपन से रास के प्रति प्रेम रहा, या ठाकुर जी स्वयं बुलाना चाहते थे, में उसके साथ रासलीला दर्शन के लिए चला गया,
प्रथम दिवस जब मेरे ठाकुर जी के आस के दर्शन किये मेरे मन से कुछ भय, निराशा, कम हो गयी, 20 प्रतिशत मेरा मन कुछ ठीक सा महसूस करने लगा, मैंने अपनी माँ को बताया घर आकर सबको अच्छा लगा, अगले दिन फिर से गया, उस दिन और ज्यादा कृपा वर्षण हुयी ठाकुर जी की, कुछ कुछ भाव अधिक जुड़ने लगे, मेरी चिंता हलकी होने लगी, आनंद आने लगा, और 25 प्रतिशत मेरे स्थिति सुधर गयी, बहुत हल्का सा महसूस हुआ, आखिर दिन की लीला दर्शन को जाना था, उससे पहिले ठाकुर जी को खिचड़ी का भोग पाने की इच्छा हुयी, ऐसा भाव मुझे आया और अपनी माँ से कहकर बाजरे की खिचड़ी का भोग तैयार किया गया जिसे मैं अपने संग लीला स्थल पर लेकर गया, व्यास जी ने भजन गया,
इस भावपूर्ण भजन के साथ ही रासमंच पर पधारे ठाकुर जी और श्री ठकुरानी जी को भोग लगाया, मैंने अपने हाथो से भोग पवाया,ठाकुर जी और प्रिया जी ने भोग पाया, मुझे अति आनंद हुआ, उसके बाद लीला मंचन हुआ, क्योंकि आज विश्राम दिवस था, तो लीला के अंत में होली उत्सव रखा गया था, जब होली उत्सव हो रहा था तो पूर्ण मस्ती का माहौल बन गया था, ऐसे में मैं पास बैठा मंच पर ही एक ओर लीला का आनंद ले रहा था की, ठाकुर जी की सहचरियों ने इशारे से मुझे अपने पास बुला लिया, और अपने रास में शामिल किया, मुझे उनके स्पर्श मात्र से ऐसी आवेश हुयी की मैं सबकुछ भुला कर वही उनके संग नृत्य करने लगा, बहुत अधिक आनंद का अनुभव,ठाकुर जी, प्रिया जी और सहचरिया संग मैं स्वयं बहुत आनंद से नाच गा रहे थे, रास पूर्ण हुआ, आरती होने लगी. श्यामाश्याम जी सिंघासन पर विराजमान है, आरती हो रही है, अब आरती के बाद ठाकुर जी और प्रिया जी को भीतर लौटना था,
उनके लौटने के लिए सिंघासन से जैसे ही नीचे उतरना था, मेरे मन में ऐसा भाव आया की ठाकुर जी मेरी हथेली पर पाँव धरे और फिर निकले, तो मैंने उन्हें विनती की ऐसा करने को, तो ठाकुर जी ने प्रिया जी को आगे किया की पहले आप निकलो अपने चरण धर कर फिर पीछे आप आये, ऐसा होते होते ठाकुर जी दो कदम बढ़े की लोट कर आये और मेरे मस्तक पर हाथ धर कहा, की ऐसे ही मुझसे प्रेम करते रहना, मुझे सदैव याद रखना,
वह दिवस और उसके बाद मेरा डीप्रेशन कहा गया मुझे नहीं मालूम, कर्मो की गति सबको भोगनी पड़ती है,लेकिन कैसे भी कर्मो का भोग करे यदि ठाकुर जी का प्रेम हमारे साथ है तो सभी दुःख-सुख में आनंद रहता है, मैं आभारी हूँ रासलीला का, रासमण्डल का जो इतने भाव से लीला दर्शन करवाते है,रासबिहारी जी का जो भक्तो के प्रेम वश रास रचाते है,
आप सभी से भी यही विनय कर रहा हूँ,कि आप भी कभी ऐसा अनुभव कर रहे हो,तो एकबार भाव से रससलीला दर्शन कीजिये,जब भी मौका मिले अपने बच्चो को लीला दर्शन करवाए, मेडिकल साइंस अपनी जगह है किन्तु ठाकुर जी कि कृपा सर्वोपरि है,मेरे निजी अनुभव के आधार से कह रहा हूँ आप भी प्रेम भाव से लीला दर्शन अवश्य करे, कोई न कोई अनुभव आपको भी होगा और आप भी हम सब के साथ अपने अनुभव शेयर कीजिये,
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