अतिरेक हर्ष और अतिरेक दुःख कैकई जो राम जी से बहुत स्नेह रखती थी,भारत से भी ज्यादा राम को लाड लड़ाया करती थी अकस्मात ऐसा क्या हो गया उनकी...
अतिरेक हर्ष और अतिरेक दुःख
कैकई जो राम जी से बहुत स्नेह रखती थी,भारत से भी ज्यादा राम को लाड लड़ाया करती थी अकस्मात ऐसा क्या हो गया उनकी सद्बुद्धि दुर्बुद्धि में बदल गयी, जो रिश्ते चाशनी जैसे मधुर थे आज नीम चढ़े करेले के भांति क्यों हो गए? ऐसा केवल तभी होता है जब हम वैकल्पिक सम्बन्धो को अधिक तवज्जो अर्थात महत्व देने लगते है, खून के रिश्ते और अपनों को पराया समझने लगते है, कैकई का मंथरा से वैकल्पिक रिश्ता है वह कोई उसके परिवार की सदस्य नहीं थी, किन्तु उसकी बुद्धि का प्रभाव जब कैकई ने अपने जीवन में उतरा तो सारा गृहस्थ जीवन और सम्बन्ध बिखर गए,
इसीलिए कभी भी बहार के लोगो से प्रभावित नहीं होना चाहिए, प्रेम से ही गृहस्थी की नौका बिना डगमगाए चलती है, कभी डोलने भी लगे तो प्रेम वो पतवार है जो बड़े से बड़े कष्टों को सहने की शक्ति एक परिवार को प्रदान करता है, डोलते हुए भी संभाल लेता है,
आज राजतिलक की घोषणा हो गयी है, राजा राम होंगे अवध राजधानी, आज पिता दशरथ के पाँव जमीं पर नहीं पड़ रहे है, हर्ष की अतिरेक सीमा को महसूस कर रहे है, किसी को कुछ कहना है बोल कुछ और रहे है, कभी जाना किसी दिशा में होता है चले कहीं और जा रहे है, अर्थात अत्यंत हर्षित है आज राजा दशरथ, ऐसी स्थिति है आनंद और हर्ष की की उनकी बुद्धि कल्पनाओ से चित्र मन के चित्रपट पर उकेर रही है, ऐसी स्थिति में राजा को कैकई का सन्देश मिलना और कोप भवन में जाना किन्तु ये समझ नहीं पाना की ऐसे सुअवसर पर ये क्या हो रहा है, वह समझ ही नहीं पा रहे क्योंकि हर्ष में उन्मादित है की राम का राज्याभिषेक होने वाला है,
जब कैकई का भीषण कुरूप धारण किये देखा तब भी नहीं चौकस हुए की ऐसा क्यों है? क्योंकि हर्ष का अतिरेक बुद्धि का संयम हर लेता है, जब कैकई ने दो वरदान मांगने की बात कही तब भी दशरथ को विवेक नहीं हुआ,पल भर के लिए यह नहीं सोचा की ऐसी सुंदर घड़ी में कोई घर की स्त्री ऐसा रूप धारण कर बैठी है, और ऊपर से जो वर्षो पहले से वर मांगने थे आज इस घडी में मांग रही है तो अवश्य कोई अनहोनी हो सकती है, किन्तु अति ख़ुशी के कारन उन्माद के कारन, ख़ुशी के अभिमान के कारण अर्थात जब मनुष्य अत्यंत खुसी के माहौल में होता है तो वह हां हां सब हो जायेगा ऐसा सा अभिमानित हो जाता है, विवेक खो जाता है,
राजा दशरथ की भी यही दशा है जोश जोश में कह दिया दो नहीं जितने चाहिए, उतने वर मांग लो, आज हम अति प्रसन्न है,यदि उस समय थोड़ा विवेक होता, थोड़ा संयम होता, तो राजा को विचार होता की जरूर कुछ गड़बड़ है, आज ऐसे मोके पर सवाल-जवाब और वर मांगने की बात क्यों हो रही है? अगर थोड़ा सा विचार किया जाता तो सब समझ हो जाती की कोई अनिष्ट हो सकता है, इसलिए थोड़ा ठहर कर बात को समझा जाए,
ऐसा ही हमारे जीवन में होता है, अति हर्ष और अति दुःख के समय मन भटक जाता है, संयम खो जाता है, बुद्धि सही देख नहीं पाती इसीलिए कहा जाता है की अति हर्ष और अति दुःख के समय कोई भी निर्णय लेना गलत है और उस समय कोई निर्णय लेना टाल देना चाहिए,
अति हर्ष और दुःख की स्थिति में मन के भाव प्रतिक्षण बदलते रहते है, हर्ष में मन हर्षित हो केर गर्व महसूस करता है तो ऐसी स्थिति में सही निर्णय नहीं हो पता, ऐसे ही दुःख में दुखित मन टुटा हुआ होता है, घबराया होता है, पीड़ित और करुणामयी भरा होता जाता है, इसमें सोचने समझने की क्षमता नहीं रहती जिससे की ऐसी स्थिति में कोई भी निर्णय लेना हानिकारक होता है, मन की दशा दुःख से प्रभावित होने के कारन सोचने समझने की क्षमता खो देती है, ऐसे समय में सोच समझकर किसी भी बात का निर्णय लेना टालना ही उचित होता है, इसलिए थोड़ा विवेक धारण कर मनुष्य को समभाव की दशा में निर्णय लेना चाहिए,
COMMENTS