भक्तिमति शबरी जो क़ी जाति से भीलनी थी न कोई विशिष्ट ज्ञानमयी थी ना हि कोई जप तप व्रत ध्यान का नियम जानती थी किन्तु अपने विवाह उत्सव ...
भक्तिमति शबरी
जो क़ी जाति से भीलनी थी न कोई विशिष्ट ज्ञानमयी थी ना हि कोई जप तप व्रत ध्यान का नियम
जानती थी किन्तु अपने विवाह उत्सव मै होने वाली हिंसा अर्थात पशु हत्या के विचार ने
उन्हें भक्ति के मार्ग पर मोड़ दिया, जैसे क़ी कहा जाता है, शबरी भीलों के राजा क़ी पुत्री
थी, उनके विवाह के समय बहुत से पशुओ को कटा जाना था क्योंकि बरात मै भोजन के लिए मांस
का आयोजन था, जब शबरी ने देखा तो उनका मन इस हिंसा से करूँध हो गया और वह अपना घर छोड़
कर ऋषि के आश्रम मै चली गयी और वहीं रहने लगी, अपना जीवन वहीँ संतो क़ी सेवा मै समर्पित
कर दिया, जब उनके गुरु स्वधाम जाने लगे तो शबरी से बोले, " तुम यही आश्रम मै रहकर
अपने भक्तिभाव मै लगी रहना, एक दिन प्रभु श्री राम यह आकर तुम्हे दर्शन देंगे,"
केवल अपने गुरु के इस एक वाकया के अवलंब से शबरी आश्रम मे रहती और अपने भक्ति भावों
मे मग्न संतो क़ी सेवा करती थी और प्रभु के आने का इन्तजार करती रहती थी, गुरूजी के
एक वचन के सहारे सम्पूर्ण जीवन रामनाम मे विलीन कर दिया, वह नही जानती थी क़ी उसे कब
प्रभु के दर्शन होंगे,कहा से प्रभु आएंगे, कैसे प्रभु से मिलन होगा, प्रभु का स्वरुप
कैसा होगा? कुछ भी नही जानती थी केवल गुरुवाक्य का विशवास था जिसे उसने अपने जीवन का
ध्येय और नियम बना लिया था और उसी भाव मे इतनी तलिन हो गयी क़ी अपनी भक्ति को चरम सीमा
तक ले गयी, दिन रात केवल रामनाम क़ी रटना, न कोई मान अपमान क़ी परवाह न कोई संसार क़ी
चिंता,केवल और केवल रामनाम का भाव, उनका भाव इतना दृढ थे क़ी
पथिकन
ते पूछत स्प्रेम प्रभु पेखी - पेखी शबरी ह्मारी प्यारी बसे केहि ठौर हैं, ,
कौन
वाको ग्राम इहाँ कौन वाको नाम कहे कौन वाको धाम जासों काम एक मोर हैं,
कौन
घरी ऐहें जामें नयननि निहारिहों मैं खैहो फल क्षुधा स्वाद सरिस अथोर हैं,
रघुराज
जै छिन विलोकिना सों बीतत पलक सम कलप करोर हैं,
पुछि-पुछि
आये तहँ शबरी स्थान जहाँ कहाँ वह भागवती देखौं दृग प्यासे हैं,
आय
गई आश्रम में जानि के पधारे आप ही ते साष्टांग करी चख भासे हैं,
खकि
उठाय लई विथा तनु दूर गई नै निर्झरी नैन प्रे प्रेम पासे हैं,
बैठे
सुख पाई फल खाइके सराहे वेई कहो कहा कहौं मेरे मग दुःख नासे हैं,
श्रीराम को स्वयं उसे दर्शन देने वन मे आना पड़ा,न
केवल दर्शन दिए बल्कि शबरी के झुठे फल खाए,
शबरी के स्थान पर पहुंच कर भगवान उन्हें
वहां न पाकर पूछते हैं कि भाग्यशालिनी हरिभक्ता कहाँ हैं, मेरे नेत्र उसके दर्शन रूपी
क्षुधा के प्यासे है,
स्वयं रघुनाथ सरकार मेरे आश्रम में
पधारें है, यह जानकर शबरी जी भी आश्रम कि और दौड़ पड़ी, जहां से पर्भु दिखाई दिए वहीं
से साष्टांग प्रणाम किया, नेत्र प्रफुलित हो गए, कंठ अवरुद्ध हो गए, ऐसे भाव विभोर
भीलनी कि दशा देखकर करुणासिंधु भगवन उसकी और दौड़ पड़े और उठकर गले से लगा लिया, कोमल
कर-कमलों का स्पर्श पाते ही तन-मन से सब व्यथा दूर हो गई, नेत्रों से निर्झर प्रेमाश्रुओं
कि धारा अविरल बह रही है, प्रेम के पासे भाग्यवश अनुकूल पद गए है, भगवान परम सुखी होकर
आसान पर विराजते है, भीलनी ने प्रेम से बेर और फल इत्यादि प्रभु को निवेदन किया, प्रभु
ने उन्हें खा कर बारबार उनके स्वाद कि प्रशंसा क़ी और कहने लगे, मैं क्या कहूँ, आज सुमधुर
फल खाकर मार्ग का सारा श्रम और दुःख मिट गए है, प्रभु क़ी महिमा देखो जो सबका दुःख हरण
करते है, अपनी भक्त को मान देने के लिए उनकी प्रशंसा करते हैं,"
पद:
शबरी थारा मीठा लगे री बोर ,
इन बेरन में कोउ अति मीठे जिनकी खांडी
कोर,
कबहुँक मैया हमहीं लै देति इनमे स्वाद
कछु और,
खात सराहत दोउ भइया कोसल राज किशोर,
तुलसीदास यह प्रभुं क़ी करुणा हिये
बसो निशि भोर,
श्री रघुनाथ जी ने कहाँ,शबरी कितने
दिनों के बाद जैसे मैया के हाथ से भोजन करके मैं तृप्त होता था वैसे ही आज तृप्त हो
रहा हूँ,
भक्त
का मान भगवान अपने मान से भी अधिक रखते है,
एकबार शबरी मार्ग सेवा कर रही थी,
तो कुछ ऋषि कुमारो को उनका स्पर्श हो गया, बार बार क्षमा मांगने पर भी वह भीलनी को
क्रोध करते रहे और फिर से स्नान करने सरोवर पर गए, भक्त का अपमान के दोष से जल मलिन
हो गया और उसमे कीड़े पद गए, मंदबुद्धि कुमारो ने सोचा यह सब शबरी के कारन हुआ है, वह
अछूता नारी हम से छू गई तभी ऐसा हुआ है, उसे दोसी मानकर उसे अपमानित करते रहते थे,
लकिन जब श्रीराम शबरी क़ी कुतिया में
पधारे तो सब वहां पर गए, और भगवान से सरोवर का जल पवित्र करने के लिए कहा, प्रभु ने
जैसे हि जल स्पर्श किया वह और अधिक मलिन हो गया, क्योंकि अपमान तो भक्त का हुआ है,फिर
प्रभु कैसे यह महिमा अपने नाम कर लेते, ऋषिकुमारों ने यह देखा तो भगवान को सधारण राजकुमार
मानने लगे,,भगवान ने कहा एकबार मेरे कहने से शबरी को कहो क़ी इस जल को अपने चरणो से
स्पर्श कर दे तो यह पवित्र हो जाएगा, तब सभी ने प्रार्थना क़ी शबरी को क़ी वह ऐसा कर
दे, तब शबरी ने अपनी अधमता क़ी बात कहीं, " अधम ते अधम अति नारी, तिन्ह महँ मैं
मति मंद अघारी"
रामजी ने कहाँ, हाथ जोड़ने से काम नही
चल रहा हैं, पाँव पकड़ लो इनके, ऋषिकुमार जैसे हि आगे बढ़े,शबरी जी भागने लगी, तब प्रभु
बोले, इनकी चरण रज हि लेकर सरोवर में दाल दो, ऐसा करते हि वह जल पवित्र हो गया,
अधिक बढ़ावत आपते, जन महिमा रघुबीर,
शबरी पदरज परसते शुद्ध भयो सर नीर,
भगवान कहते हैं, "ये में भक्तजनः पार्थ न में भक्ताश्च ते
जनाः ,
मद्भक्तानां
च ये भक्तास्ते में भक्तत्मा मताः"
अर्थात, हे पार्थ! जो केवल मेरे भक्त
है,वस्तुतः वे मेरे भक्त नही हैं, जो मेरे भक्तों क़ी भक्ति करते हैं, वास्तव में व्ही
मेरे सच्चे भक्त हैं, अतः " जो दोषी है
संत के, हरी दोषी सौ बार, भजन करत सेवा करत दुबैगो मझधार"
और ऋषिकुमारो को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसकी
क्षमायाचना के लिए वन में शबरीनारायण का मंदिर बनाकर पूजा अर्चना करने लगे,
नवधा भक्ति का ज्ञान दिया ,
कह
रघुपति सुनु भामिनि बता, मानौ एक भगति कर नाता,
जातिं
पाती कुल धरम बड़ाई,धन बल परिजन गुण चतुराई,
भगति
हीन नर सोहहीं कैसे,बिनु जल बारिद देखिअ जैसा,
नवधा
भक्ति कहउ तोहि पांहि,सावधान सुनु धरु मन माहीं,
प्रथम
भक्ति संतान कर संगा, दूसरी रति मम कथा प्रसंगा
गुरुपद
पंकज सेवा, तीसरी भगति अमान
मंत्र
जप मम दृढ विश्वासा,पंचम भजन सौ वेद प्रकाशा
छात
दम शील बिरति भू करमा,निरत निरन्तर सज्जन धरमा,
सातवां
सम मोहि मय जग देखा, मोते संत अधिक कर लेखा,
आठव जथा लाभ संतोषा,सपनेहु नही देखइ परदोषा
नवम
सरल सब सं छल हीना,मम भरोस हिय हरष न दीना,
नव
महुँ एकउ जिन्हके होइ, नारी पुरुष सचराचर कोई,
सोई
अतिसय प्रिये भामिनि मोरे, सकल प्रकार भगति दृढ तोरे,
जोगी
वृन्द दुर्लभ गति जोई, तो कहूँ आजु सुलभ भई सोई
और निजधाम मे उनको स्थान दिया,
अति प्रीति मानस राखि रामहिं रामधामहिं
सौ गई,
तेहिं मातु ज्यों रघुनाथ अपने जल अंजलि
देइ,
इस प्रकार शबरी जैसे भक्तों क़ी कथा
हमारा मार्गदर्शन करती है, क़ी किस प्रकार निश्छल भक्ति करने से भक्त भगवान को इतने
अधिक प्रिय हो जाते है क़ी प्रभु उनको मान देने के लिए अपनी प्रभुता भूल जाते है,और
प्रेम के वष अपने भक्तो क़ी कथा गाते रहते है, और आनंदित होते हैं,
रामा रामा रटते रटते बीती रे उमरिया।
रघुकुल नंदन कब आओगे भिलनी की नगरिया॥
मैं शबरी भिलनी की जाई, भजन भाव ना जानु रे।
राम तेरे दर्शन के कारण वैन में जीवन पालूं रे॥
चरणकमल से निर्मल करदो दासी की झोपड़िया॥
रोज सवेरे वन में जाकर फल चुन चुन के लाऊंगी।
अपने प्रभु के सन्मुख रख के प्रेम से भोग लगाउंगी॥
मीठे मीठे बेरन की मैं भर लाई छबरिया॥
श्याम सलोनी मोहिनी मूरत नैयन बीच बसाऊंगी।
पद पंकज की रज धर मस्तक जीवन सफल बनाउंगी॥
अब क्या प्रभु जी भूल गए हो दासी की डगरिया॥
नाथ तेरे दर्शन की प्यासी मैं अबला इक नारी हूँ।
दर्शन बिन दोऊ नैना तरसें सुनलो बहुत दुखारी हूँ॥
रघुकुल नंदन कब आओगे भिलनी की नगरिया॥
मैं शबरी भिलनी की जाई, भजन भाव ना जानु रे।
राम तेरे दर्शन के कारण वैन में जीवन पालूं रे॥
चरणकमल से निर्मल करदो दासी की झोपड़िया॥
रोज सवेरे वन में जाकर फल चुन चुन के लाऊंगी।
अपने प्रभु के सन्मुख रख के प्रेम से भोग लगाउंगी॥
मीठे मीठे बेरन की मैं भर लाई छबरिया॥
श्याम सलोनी मोहिनी मूरत नैयन बीच बसाऊंगी।
पद पंकज की रज धर मस्तक जीवन सफल बनाउंगी॥
अब क्या प्रभु जी भूल गए हो दासी की डगरिया॥
नाथ तेरे दर्शन की प्यासी मैं अबला इक नारी हूँ।
दर्शन बिन दोऊ नैना तरसें सुनलो बहुत दुखारी हूँ॥
हीरा रूप से दर्शन देदो डालो एक नजरिया॥
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